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अंधा-बेहरा सिस्टम

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क्या आपको सबको पता है, इस तस्वीर की कीमत लगी है कुछ 2-4 लाख रुपए खरीददार है मध्य प्रदेश की बीमारू शासन प्रशासन की व्यवस्थाएं तैयार रहिएगा अब जांच होगी समिति बनेगी किसी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा, ऐसा सुनने में आएगा मौन रखा जायेगा और बस इससे ज्यादा कुछ नहीं और सबक लेना तो शब्द ही नहीं इनकी डिक्शनरी में भला इससे ज्यादा भयानक तस्वीर इस साल की कौन सी होगी, अपने आप में बोलती हुई तस्वीर, ऐसा लग रहा मानो आप सभी जानते हैं कल जबलपुर के बरगी डेम में जो हादसा हुआ यह उसका अंजाम है। कही पर सही पढ़ा था, युद्ध कुछ देशों में चल रहा जिसमें लोगों की जाने जा रही है, और अगर हम ऐसे परिस्थिति में आते तो हम हमारी सेना के माध्यम जंग तो जीत लेंगे पर अपने गृह युद्ध, लाचार सिस्टम से नहीं जीत पाएंगे। एक मां, क्या होती है इस तस्वीर से साफ समझ आता है, एक उम्मीद क्या होती है इस तस्वीर से आप साफ समझ आता है  एक माँ का ममत्व का क्या होता है इस तस्वीर से आप साफ समझ सकते है और अपने बच्चों के प्रति समर्पण भाव क्या होता है इस तस्वीर से साफ समझ आता है। 15 घंटे बाद भी अपने बच्चे को इस प्रकार पकड़े रहना, ऐसा लग रहा मानो दोन...

जीवन से जिंदगी तक :- एक पहेली

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जीवन से जिन्दगी तक :- एक पहेली अमूमन यह दोनों शब्द एक दूसरे के पर्याय माने जाते हैं, पर बारीकी से देखा जाए तो दोनो अपनी-अपनी महत्ता पर राज कर रहे हैं। कैसे, आइए जानते है :-  ईश्वर सबको एक समान जीवन प्रदान करता है बिना कोई भेदभाव, जात-पात, रंग-रोगन, ऊंच-नीच, धर्म, को देखते हुए। उस जीवन को जिंदगी में हमे ढालना होता हैं, मतलब हमें खुद अपने एक समान जीवन के सफर को सबसे अलग कर जिंदगी की सड़क पर लाना हैं। इस संसार में हर कोई यह चाहता है की उसका जीवन सरलता से आसानी से निकलता रहे, पर अगर जीवन सरलता, सुगमता से निकल रहा है तो यकीन मानिए वो जीवन उस सीधी लकीर के बराबर है जिसे देख कर अस्पताल में डॉक्टर जवाब दे देते हैं। कवि जयशंकर प्रसाद जी की बड़ी सुंदर पंक्तियां हैं :- 'वह पथ क्या, पथिक कुशलता क्या, जिस पथ पर बिखरे शूल न हों,  नाविक की धैर्य परीक्षा क्या, जब धाराएँ प्रतिकूल न हों ।। जीवन में उतार-चढाव, सुख-दुख यह सब उतने ही जरूरी हैं जितने किसी चीज को मढ़ने के लिए उच्च तपिश। बस हम गलती यहा कर बैठते है की इन अस्थाई उतार-चढ़ाव को स्थाई समझ जीवन ही समझ बैठते हैं। बल्कि यह सिर्फ व...

कहाँ कहों छवि आपकी, भले विराजे नाथ

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'कलयुग का राज्याभिषेक' 22 जनवरी 2024, यह वो दिन था जिसके लिए ना जाने कौनसे पुण्य किए होंगे जो हमारी पीढ़ी इस स्वर्णिम दिन, इस रजतमय पल के साक्षी बने। इस शीत मौसम में परसों के एक-एक पल में, सुनहरी सूर्यकिरण में, आर्द्र हवाओं में मानों अमृत घुला हुआ था। हर तरफ बस एक ही भाव एक ही नारा एक ही नाम:- जय श्री राम, जय श्री राम। हालांकि यह बोलना गलत होगा की यह कलयुग का राज्याभिषेक था, क्योंकि असल में आपके नाम में ही सारा राजस्व छुपा हुआ हैं और हम लोग तुच्छ मात्र आपका क्या राज्याभिषेक करेंगे, पर अनुभूति पूरी तरह आपके राज्याभिषेक की थी। रामायण में बड़ी अच्छी चौपाई है, मानो गोस्वामी जी ने उस दिन के लिए ही लिखी थी, बिल्कुल सटीक तरीके से वर्णन करती हैं,  सीतल मंद सुरभि बह बाऊ।  हरषित सुर संतन मन चाऊ॥ बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा।  स्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा॥ (प्रथम सोपान, बालकांड, श्रीरामचरितमानस) भावार्थ- शीतल, मंद और सुगंधित पवन बह रहा था। देवता हर्षित थे और संतों के मन में (बड़ा) चाव था। वन फूले हुए थे, पर्वतों के समूह मणियों से जगमगा रहे थे और सारी नदियाँ अमृत की धारा बहा रही थीं। मुझे न...

मृत्यु की बदलती रीतियां

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मृत्यु की बदलती रीतियां एक बेहतरीन गायक और शानदार शख्सियत कृष्णकुमार कुन्नाथ 'केके' मात्र 53 वर्ष की आयु में अचानक उस वक्त अपने फैंस को स्तब्ध छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए शांत हो गए जब वे कोलकाता के एक लाइव कार्यक्रम में मंच पर परफॉर्म कर रहे थे। अपना सबसे पसंदीदा काम करते हुए यानी गाने गाते हुए उन्होंने आखिरी साँसें ली, एक यही बात सोचकर उनके फैंस जरा सी तसल्ली महसूस कर सकते हैं। सोचने में आता है की अन्य सेलेब्रिटीज़ की तरह उन्होंने भी उस दिन हैल्दी ब्रेकफास्ट लिया होगा, दैनिक व्यायाम, योगा या जिम वर्कआउट किया होगा। कुछ लोगों के साथ व्यावसायिक मीटिंग्स की होंगीं। कार्यक्रम के लिए टिपटॉप तैयार होकर मंच पर पहुंचे होंगे जहाँ उन्हें एक यादगार हाई एनर्जी परफॉर्मेंस देनी थी। उनके शेड्यूल में अगले कुछ महीनों के कार्यक्रम पूर्व निर्धारित रहे होंगे। हो सकता है व्यस्तता इससे भी अधिक रही होंगी। दो दिन पहले जब 28 वर्षीय सिद्धू मूसेवाला की हत्या हुई, उनके पिता का वो बेबस चेहरा, उनके फैंस के सामने वो पगड़ी निकाल कर क्रतज्ञपन व आभार ज्ञापित करके का तरीका आंखे नम कर देने वाला था। भले उनके अंतिम सं...

शाश्वत जिजीविषा

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आदरांजलि दादाजी :- एक ऐसी जिजीविषा जिसके हौसले हमेशा से बुलंद रहे, जो कभी थके नहीं ना मन से और ना ही तन से।  बैरसिया नगर के वो मधु महाराज जिन्हे नाम से ज्यादा उनके अंदाज़ व् उनके किरदार से जाना जाता था। किरदार चाहे हेड मास्टरी हो, रामलीला हो, पंडिताई हो। दादाजी जिनसे मिलते उनके होकर रह जाते थे। आज भी जब विविध जगह से जुड़े हुए लोग आते तो एक ना एक उनसे जुड़ा हास्यास्पद किस्सा सुना कर ही जाते। दादाजी ने अपनी सारी जिंदगी तो पूजन-पाठ में निकाली ही सही और जब अंत समय आया तो उस दिन भी राम रक्षा स्तोत्र का दिन भर पाठ कर अपनी "हनुमान अष्टमी" सार्थक कर ली। रामलीला के 'परशुराम' बैरसिया में लगभग 150 साल से भी ज्यादा पुरानी रामलीला होती हैं। दादाजी ने भी उसमे पाठ करे, पिताजी ने भी करे और मैंने भी। जब कभी घर पर कोई चित-परिचित दादाजी के पास आते और बोलते की अब तो आप से बनती गुरुजी नहीं पहले तो बढ़िया रामलीला पाठ करते थे, ठीक उसी क्षण गुरूजी अपना हाथ का काम छोड़, अपने हाथ अपनी बाजुओं पर रखते और तनिक अपनी भौंहे चढ़ा सुनाते :-   मेरे इस लौहू कुल्हाडे़ ने लोहू की नदी बहा दी है। इस आर्य भूमि ...

एक और निर्भया ...

और एक बार फ़िर मशाल लगेगी, मोमबत्तियां जलेगी, राजनीतिक रोटियां सिकेंगी, लिपा-पोती होगी, आनन-फानन में तबादले, सरकारी आश्वासन, मुआवजे, जस्टिस इत्यादि। घटना हाथरस (यू.पी) की हैं जहां 20 साल की लड़की को निर्भया की भांति तड़पाया गया। यह सब आज और कल की घटना नहीं है बल्कि 15 दिन पुरानी हैं और इन सब में सबसे बड़ी बात यह कि जिसे हम लोकतंत्र का चौथा स्तंभ का दर्जा देते हैं, वो पिछले 15 दिन से स्पेशल कवरेज सिर्फ ज्वलंत मुद्दा जो देश को दिखाना बहुत जरूरी है चाहे वो दीपिका पादुकोण के 'माल है क्या' हो या पायल घोष की आवाज़ को दिखाना हो। अगर यही घटना कुछ दिन पहले मीडिया पर ही दिखाई गई होती तो शायद समय पर इलाज और इंसाफ दोनों मिल जाए और मासूम की जिंदगी बच जाती। अब जरूर जहां-जहां प्रदर्शन होंगे चाहे वो दिल्ली हो या हाथरस या अन्य कोई जगह सब जगह से ग्राउंड रिपोर्ट और स्पेशल कवरेज हमारी थाली में परोसा जाएगा। चुनाव के दिनों में हर ज़िले हर कस्बे से रिपोर्ट पेश की जाती हैं, फिर यह क्यों नहीं? क्या बॉलीवुड का ड्रग्स कनेक्शन के अलावा भी देश में कोई मुद्दा नहीं बचा? न्यूज़ में भी अभी हेडलाइन में लड़की के...

साधु-संत के तुम रखवाले, असुर निकंदन राम दुलारे

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हे प्रभु...  शायद पहली बार मन इतने रुदन भाव से कुछ लिखने को आतुर हैं। महाराष्ट्र पालघर की ऐसी नृशंस लोमहर्षक घटना हृदय विदारक है। दो साधु सुशील महाराज (35) और महाराज कल्पवृक्षगिरि (70) अपने गुरु/दोस्त के अंतिम दर्शन के लिए जा रहे थे। पर कहा अंदाज़ा था की नरभक्षियों के हाथों ऐसी मौत मिलेगी जो मानवता के नाम पर थू हैं। वो भी उस छत्रपति शिवाजी की धरती पर जिसके रक्त की एक-एक बूंद अपने धर्म के लिए समर्पित थी।  कौन लोग थे, कहाँ से थे, कौन मज़हब से थे, मुझे बिल्कुल नहीं पता। पर जब मैंने उनका वायरल वीडियो देखा जिसमें लाठीधारी लोग जघन्य तरीके से मार रहे हैं तो अपने आँसुओ को रोक नहीं पाया। उस वीडियो में मैंने उन बुजुर्ग के साथ-साथ उस विकलांग क़ानून को भी देखा जो शायद इतना लाचार था की सिर्फ तमाशबीन बनकर देखता रहा, रक्षा करने वाला खुद को किनारे करता रहा और धर्म के रक्षक को आगे धकेलता रहा। और उस बुजुर्ग का आशावादी चेहरा जो उस अपंग क़ानून की आड़ लेकर मदद की अपेक्षा कर रहा था।  और यह सब तब घटित हुआ जब देश में एक तरफ हर एक शख्श महामारी से लड़ रहा है। सरकार, प्रशासन, हेल्थ सर्विस से जुड़े हर एक ...

दरिंदगी की भी हद

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बीते कुछ दिनों से जो 3-4 घटनाये सामने आयी हैं, उनसे आज के समाज का वो काला चेहरा सामने आ रहा हैं, जो समाज के बीच में ही नक़ाब पहना हुआ हैं। चाहे हो अलीगढ़ हों, उज्जैन हों, हमीरपुर हों या आज राजधानी भोपाल की घटना हों। ऐसी नृशंस हत्याएं बूढ़े कानून का नतीज़ा हैं। जहाँ एक तरफ़ सरकारें गाजे-बाजे के साथ "बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ" ढोल पीट रहीं, वही दूसरी तरफ़ नतीज़े शर्मनाक आ रहें। ज़रा देखें तो हँसने-खेलने की उम्र में मासूमो की मौत परिवार के लिए वो घाव हैं जिसे वो कभी मिटा नहीं सकते। जिस घर में किलकारी गूंजती थी आज उसके फोटो के आगे सिर्फ यादों के साथ बैठना, कराहना किसी नर्क से कम नहीं। 2 साल, 10 साल, 11 साल यह उम्र में ऐसी दरिंदगी सिर्फ हैवानियत हैं। कुछ राजनीति रुपी मोमबत्तियां ही जलाने का समय आ गया हैं, जो कुछ नारीवादी लोग जलाएंगे, शासन-प्रशासन को उस परिवार का दर्द कभी दिखेगा ही नहीं। अभी उज्जैन में कुछ दिन पहले नगर निगम के जिम्मेदार बेहरुपियो की लापरवाही एक मासूम बच्चे की मौत  का कारण बनीं, पार्क में रखीं बेंच गिरने से 11 वर्षीय बालक की मौत। बस अब आरोप इधर-...

"घर की खुशबू ही माँ हैं"

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 "माँ"  कितना खूबसूरत सा अक्षर हैं.... एक ऐसा किरदार जिसे जैसा जहॉ भी ढालो, वो अपने दायित्व से कभी नहीं मुकरती। चाहे जो भी परिस्थति हों मैने कभी माँ को थकते नहीं देखा।  माँ एक मोम की तरह जो हर परिस्थियों में डटे रहती हैं, और अगर नहीं तो खुद तो पिघल जाती हैं पर बशर्ते पुरे समां को रोशनी से जगमगा कर।  पूरा घर ही माँ से रौशन है, घर की रौनक माँ हैं, घर की खुशबू ही माँ हैं। माँ ईश्वर का वो सुन्दर सृजन है जिसे स्वयं ईश्वर भी पूजता हैं। माँ के भी अनेक रूप हैं, इस संसार का भरण-पौषण ही उस आद्यशक्ति माँ के हाथों में हैं। चाहे वो अन्नपूर्णा हो या चाहे माँ गंगा।  एक माँ का किरदार ही हर घर को जीवंत बनाए रखता हैं।  कल में जब यह लिख रहा था तब मुझसे मेरे दोस्त ने जिज्ञासा वश पूछा था की अगर माँ कभी अपनों का बुरा कभी नहीं चाहती तो रामायण में कैकई जो राम को सबसे ज्यादा स्नेह करती थीं, उन्होंने वनवास क्यों दिया ? कैकई ने राजा दशरथ से पहले वचन लिया उसके बाद बोला:- " देहु एक बर ...

कुंभ 2019

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अभी महाशिवरात्रि पर प्रयागराज में अर्धकुम्भ का समापन हुआ। इस कुंभ में लगभग 25 करोड़ लोगो ने संगम में आस्था की डुबकी लगाई। मुझे याद है 2016 में जब उज्जैन में सिंहस्थ था, तब उसके समापन के बाद नानाजी से सिंहस्थ से जुडी कुछ बात कर रहा था, तब उन्होंने एक कविता सुनाई। सिंहस्थ साधु-संतो का त्यौहार हैं, अलग अलग अखाड़ों से साधु आते हैं, सब अपनी मस्ती में मस्त। उनके विभिन्न प्रकार के रूप देखने को मिलते हैं, इसपर नानाजी ने जो बताया वो आज भी याद हैं, आज उनकी याद आयी तो यह कविता याद आयी। वें बोलें :- नख बिन कटा देखें, शीश भारी जटा देखें, साधु कन फटा देखें, छार लगाए तन में, मौनी अनमोल देखें, सेवड़ा सिरछौल देखें, करत तपस्या देखें, वनखंडी वन में, शूर देखें, वीर देखें, सब धनी और कूर देखें, माया के पूर देखें, जो भूल रहें हैं धन में, आदि अनंत सुखी देखें, जन्मों के दुखी देखें, पर साधु वो नहीं देखें, जिनके लोभ नहीं मन में...

न स्त्रीरत्नसमं रत्नम

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आज कुछ पोस्ट देख रहा था उसमें बहुत अच्छी बात पढ़ने में आयीं कीं जब आप एक लड़के को शिक्षित बनाते हों तो उसकी शिक्षा उस तक हीं सीमित रहती हैं, पर जब एक लड़की को शिक्षित बनाते हों तो पूरी एक पीढ़ी को शिक्षित बनाने के समान हैं। वाक़ई में नारी ईश्वर कीं वो सुंदर रचना हैं जिसकी किसी से तुलना करने का सोच भी नहीं सकते। हर एक किरदार को बख़ूबी सिर्फ़ एक महिला हीं निभा सकती हैं। किरदार से मतलब चाहे माँ का रूप हों, बहन का प्यार हों, बेटी की किलक़िलाहट हों... मनुस्मृति में लिखा है:- यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवत:। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।। (मनुस्मृति 3/56) अर्थात् जहाँ स्त्रियों का आदर किया जाता है, वहाँ देवता रमण करते हैं और जहाँ स्त्री का अनादर होता है, वहाँ सब कार्य निष्फल होते हैं। और अभी से नहीं, पुराणो से स्त्री को पहले स्थान पर दर्जा दिया गया हैं। सीता-राम, राधा-कृष्ण। नारी को शक्ति का रूप भी कहा गया हैं, शक्ति बिन तो आदिदेव शिव भी अधूरे हैं। देखा जाए तो हर चीज़ नारी से जुड़ी हैं या यह बोल सकते कीं उसके बिना अधूरी हैं:- जल, जीवन, प्रकृ...

बोलती तस्वीरें...

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बोलती तस्वीरें.... !!! पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर कुछ फोटो देखने में आये हैं जो अपने आप बोलने में सक्षम हैं और हर तस्वीरें कही न कही आजकल की राजनीति का चेहरा दर्शाती हैं। राजनीति का अर्थ उसके शब्द में ही झलकता हैं, "राज करने की नीति"। पर आज के समय में राजनीति जैसे सिर्फ धर्म की, समाज की, जातियों की, चापलूसों की, चाटुकारिता की ही हो गयी हैं।  यह जो ऊपर लिखा है इसमें से एक भी राजनीति में नहीं आना चाहिए बल्कि धर्म के उत्थान की, समाजो के कल्याण की, भुखमरी की, बेरोजगारी इत्यादि की होना चाहिए।  विचारणीय हैं राम मंदिर के नाम से, गौ माता के नाम से, और अब तो भगवान् हनुमान भी इसमें लपेटे हुए दिख रहे हैं। दलित, जाट, जैन, मुस्लिम और ना जाने कौन-कौन सी जाती रूपी मोतियों की माला भगवान् हनुमान को अर्पण कर दी गयी हैं। मुझे नहीं पता की यह फोटो कबक़े हैं। पर आज भी ऐसे दृश्य देखने को मिलना सामान्य बात हैं। देखकर मन में सिर्फ एक ही प्रश्न आता हैं। क्या सही में मेरा देश बदल  रहा हैं ? यह दोनों फोटो ही बोलते हुए फोटो हैं। देखते ही समझ...

करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान

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बचपन में हमेशा से सुना हैं की किसी कार्य में निपुण होना हैं तो अभ्यास जरुरी हैं। श्रीरामचरितमानस में उल्लेख हैं "करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान"। बस अगर कोई चीज़ हमें किसी से अलग बनाती हैं तो वो हैं उसे करने का का तरीका। किसी ने लिखा हैं की "एक पत्थर ठोकर खाकर कंकर-कंकर हों गया और एक पत्थर ठोकर खाकर शंकर-शंकर हों गया"। साफ़ समझ आता हैं की काम एक ही हैं पर कोई कंकर हुआ तो कोई शंकर। निरंतर अभ्यास किया जाये तो पारंगत होने में देर नहीं लगेगी। अगर उदाहरण की ओर बात की जाये तो वो हैं एकलव्य का जिन्होंने बिना सीखे, गुरु के अभाव में धनुर्विद्या में ऐसी पारंगत हासिल की जिन गुरु द्रोणाचार्य ने उन्हें अपना शिष्य बनाने से मना कर दिया था, वो भी उस विद्या के कायल हों गए।  एक और शायद इससे अच्छा और उदाहरण नहीं हों सकता वो हैं करोली टेकक्स (Karoly Takacs) का, हंगरी (Hungary) सेना के एक जाबांज़ शूटर जो कई नेशनल, कई खिताबों से नवाज़ा जा चूका था पर जिनका बस एक सपना था की ओलिंपिक में गोल्ड जितना।  1936 तक उनसे अच्छा कोई राइट हैंडेड पिस...

हैवानियत की हद ...!!

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कही पर सुना था की यदि कोई गलती हो जाए तो हो सकता वह सच में गलती से ही हुई हो। पर अगर वही गलती बार-बार दोहराई जाए तो निसंदेह वह सोची समझी साजिश हैं।  आज जब पेपर (20 सितम्बर) पर फ्रंट पेज की खबर पड़ी तो एक पल के लिए रूह काँप गयी। खबर थी बीएसएफ के जवान शहीद श्री नरेंद्र सिंह की। सैय्यादों ने 9 घंटे सेना के जवान को मौत का आइना दिखाया, 9 घंटे तक वो बेहरहमी से तड़पाते रहे, कभी करंट लगाया, पैर काट दिया, आँख निकाल ली और इसके बाद भी, इतनी क्रूरता के बाद भी जब चैन न मिला तो गला घोंट कर गोली मार दी, और अंततः भारत माँ की आन-बान की रक्षा करते हुए एक और फौजी शहीद  हो गया।  इस बर्बरता पर कोई प्रश्न खड़े नहीं करता, कोई भी सत्ताधारी आपत्ति लेते हुए मुँह तोड़ जवाबी कार्रवाई का समर्थन नहीं करता और ना कोई विपक्ष में से ढ़ोल पीटता हैं।  केंद्रीय मंत्री इंद्रजीत सिंह बयांन देते है की "यह कोई नई बात नहीं है, पाकिस्तान पहले भी ऐसा करता रहा है।" क्यों ? और सबसे बड़ी विडम्बना तब देखने में आई जब कुछ दिन पहले भारतीय सेना के जवान जब एक आतंकवादी...

“हिन्दी हैं हम”

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हिंदी का इतिहास वर्षों पुराना हैं। यह सिर्फ़ एक ज़बान हीं नहीं बल्कि सांगोपांग तरीक़े से तहज़ीब भी हैं। हिन्दी के शब्द, और हिन्दी भाषा में हीं मिठास झलकतीं हैं। और एक तरीक़े से देखा जाए तो हिन्दी का ह्रदय विशाल हैं जों अपने अधीन बहुत सीं उपभाषाए को समेटा हुआ हैं, जैसे:- मालवी, अवधी, ब्रजभाषा इत्यादि। 1977 में जनता सरकार में विदेश मंत्री के तौर पर काम कर रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने जब संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपना पहला भाषण हिंदी में दिया तब पुरे सदन ने खड़े होकर अभिवादन किया था। हिन्दी दुनियाभर की भाषाओ में अपना विशेष स्थान, अपनी महत्वत्ता के कारण बनाई हुईं हैं। किसी ने कटाक्ष करते हुए कहाँ हैं कीं जिस देश में हिंदी के लियें “2” दबाना पड़े, वह उस देश कीं राजभाषा कैसे हों सकतीं हैं? पर अगर देखा जाए तो आज हिन्दी बोलने में लोग शर्म महसूस करते हैं, मुझे नहीं पता क्यों ऐसा हैं पर में बस इतना हीं बोलना चाहूँगा कीं हिन्दी हिंदुस्तान की सिर्फ़ भाषा नहीं बल्कि मातृभाषा हैं, और दुनिया कीं भाषायें भले कितनी हीं अच्छी हों पर मेरी माँ से ख़ूबसूरत नहीं हों सकतीं। सिर्फ़ हिन्दी में हीं ताक़त ...