दरिंदगी की भी हद


बीते कुछ दिनों से जो 3-4 घटनाये सामने आयी हैं, उनसे आज के समाज का वो काला चेहरा सामने आ रहा हैं, जो समाज के बीच में ही नक़ाब पहना हुआ हैं।
चाहे हो अलीगढ़ हों, उज्जैन हों, हमीरपुर हों या आज राजधानी भोपाल की घटना हों।
ऐसी नृशंस हत्याएं बूढ़े कानून का नतीज़ा हैं। जहाँ एक तरफ़ सरकारें गाजे-बाजे के साथ "बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ" ढोल पीट रहीं, वही दूसरी तरफ़ नतीज़े शर्मनाक आ रहें।
ज़रा देखें तो हँसने-खेलने की उम्र में मासूमो की मौत परिवार के लिए वो घाव हैं जिसे वो कभी मिटा नहीं सकते। जिस घर में किलकारी गूंजती थी आज उसके फोटो के आगे सिर्फ यादों के साथ बैठना, कराहना किसी नर्क से कम नहीं।
2 साल, 10 साल, 11 साल यह उम्र में ऐसी दरिंदगी सिर्फ हैवानियत हैं।

कुछ राजनीति रुपी मोमबत्तियां ही जलाने का समय आ गया हैं, जो कुछ नारीवादी लोग जलाएंगे, शासन-प्रशासन को उस परिवार का दर्द कभी दिखेगा ही नहीं।
अभी उज्जैन में कुछ दिन पहले नगर निगम के जिम्मेदार बेहरुपियो की लापरवाही एक मासूम बच्चे की मौत  का कारण बनीं, पार्क में रखीं बेंच गिरने से 11 वर्षीय बालक की मौत।
बस अब आरोप इधर-उधर करके, इसके-उसके मत्थे करने का काम चल रहा हैं।
जो कुलदीप था घर का उसकी सिर्फ यादें रह गयीं। न कोई कारवाई, न सुनवाई क्योंकि वो आम-आदमी का बेटा था।
आखिर कबतक सिर्फ 4 दिन का रोना रोकर यह नाटक चलता रहेगा ?
यह देख कर सिर्फ यही लगता :- " ना आना इस देश लाडो "
यहाँ तुझे 9 दिन तो पूजेंगे पर उसके बाद तेरा हश्र भगवान भी न जानता.....
तात्कालिक कड़ी कारवाई की अपेक्षा।

शर्मनाक........


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