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"घर की खुशबू ही माँ हैं"

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 "माँ"  कितना खूबसूरत सा अक्षर हैं.... एक ऐसा किरदार जिसे जैसा जहॉ भी ढालो, वो अपने दायित्व से कभी नहीं मुकरती। चाहे जो भी परिस्थति हों मैने कभी माँ को थकते नहीं देखा।  माँ एक मोम की तरह जो हर परिस्थियों में डटे रहती हैं, और अगर नहीं तो खुद तो पिघल जाती हैं पर बशर्ते पुरे समां को रोशनी से जगमगा कर।  पूरा घर ही माँ से रौशन है, घर की रौनक माँ हैं, घर की खुशबू ही माँ हैं। माँ ईश्वर का वो सुन्दर सृजन है जिसे स्वयं ईश्वर भी पूजता हैं। माँ के भी अनेक रूप हैं, इस संसार का भरण-पौषण ही उस आद्यशक्ति माँ के हाथों में हैं। चाहे वो अन्नपूर्णा हो या चाहे माँ गंगा।  एक माँ का किरदार ही हर घर को जीवंत बनाए रखता हैं।  कल में जब यह लिख रहा था तब मुझसे मेरे दोस्त ने जिज्ञासा वश पूछा था की अगर माँ कभी अपनों का बुरा कभी नहीं चाहती तो रामायण में कैकई जो राम को सबसे ज्यादा स्नेह करती थीं, उन्होंने वनवास क्यों दिया ? कैकई ने राजा दशरथ से पहले वचन लिया उसके बाद बोला:- " देहु एक बर ...

कुंभ 2019

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अभी महाशिवरात्रि पर प्रयागराज में अर्धकुम्भ का समापन हुआ। इस कुंभ में लगभग 25 करोड़ लोगो ने संगम में आस्था की डुबकी लगाई। मुझे याद है 2016 में जब उज्जैन में सिंहस्थ था, तब उसके समापन के बाद नानाजी से सिंहस्थ से जुडी कुछ बात कर रहा था, तब उन्होंने एक कविता सुनाई। सिंहस्थ साधु-संतो का त्यौहार हैं, अलग अलग अखाड़ों से साधु आते हैं, सब अपनी मस्ती में मस्त। उनके विभिन्न प्रकार के रूप देखने को मिलते हैं, इसपर नानाजी ने जो बताया वो आज भी याद हैं, आज उनकी याद आयी तो यह कविता याद आयी। वें बोलें :- नख बिन कटा देखें, शीश भारी जटा देखें, साधु कन फटा देखें, छार लगाए तन में, मौनी अनमोल देखें, सेवड़ा सिरछौल देखें, करत तपस्या देखें, वनखंडी वन में, शूर देखें, वीर देखें, सब धनी और कूर देखें, माया के पूर देखें, जो भूल रहें हैं धन में, आदि अनंत सुखी देखें, जन्मों के दुखी देखें, पर साधु वो नहीं देखें, जिनके लोभ नहीं मन में...

न स्त्रीरत्नसमं रत्नम

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आज कुछ पोस्ट देख रहा था उसमें बहुत अच्छी बात पढ़ने में आयीं कीं जब आप एक लड़के को शिक्षित बनाते हों तो उसकी शिक्षा उस तक हीं सीमित रहती हैं, पर जब एक लड़की को शिक्षित बनाते हों तो पूरी एक पीढ़ी को शिक्षित बनाने के समान हैं। वाक़ई में नारी ईश्वर कीं वो सुंदर रचना हैं जिसकी किसी से तुलना करने का सोच भी नहीं सकते। हर एक किरदार को बख़ूबी सिर्फ़ एक महिला हीं निभा सकती हैं। किरदार से मतलब चाहे माँ का रूप हों, बहन का प्यार हों, बेटी की किलक़िलाहट हों... मनुस्मृति में लिखा है:- यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवत:। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।। (मनुस्मृति 3/56) अर्थात् जहाँ स्त्रियों का आदर किया जाता है, वहाँ देवता रमण करते हैं और जहाँ स्त्री का अनादर होता है, वहाँ सब कार्य निष्फल होते हैं। और अभी से नहीं, पुराणो से स्त्री को पहले स्थान पर दर्जा दिया गया हैं। सीता-राम, राधा-कृष्ण। नारी को शक्ति का रूप भी कहा गया हैं, शक्ति बिन तो आदिदेव शिव भी अधूरे हैं। देखा जाए तो हर चीज़ नारी से जुड़ी हैं या यह बोल सकते कीं उसके बिना अधूरी हैं:- जल, जीवन, प्रकृ...

बोलती तस्वीरें...

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बोलती तस्वीरें.... !!! पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर कुछ फोटो देखने में आये हैं जो अपने आप बोलने में सक्षम हैं और हर तस्वीरें कही न कही आजकल की राजनीति का चेहरा दर्शाती हैं। राजनीति का अर्थ उसके शब्द में ही झलकता हैं, "राज करने की नीति"। पर आज के समय में राजनीति जैसे सिर्फ धर्म की, समाज की, जातियों की, चापलूसों की, चाटुकारिता की ही हो गयी हैं।  यह जो ऊपर लिखा है इसमें से एक भी राजनीति में नहीं आना चाहिए बल्कि धर्म के उत्थान की, समाजो के कल्याण की, भुखमरी की, बेरोजगारी इत्यादि की होना चाहिए।  विचारणीय हैं राम मंदिर के नाम से, गौ माता के नाम से, और अब तो भगवान् हनुमान भी इसमें लपेटे हुए दिख रहे हैं। दलित, जाट, जैन, मुस्लिम और ना जाने कौन-कौन सी जाती रूपी मोतियों की माला भगवान् हनुमान को अर्पण कर दी गयी हैं। मुझे नहीं पता की यह फोटो कबक़े हैं। पर आज भी ऐसे दृश्य देखने को मिलना सामान्य बात हैं। देखकर मन में सिर्फ एक ही प्रश्न आता हैं। क्या सही में मेरा देश बदल  रहा हैं ? यह दोनों फोटो ही बोलते हुए फोटो हैं। देखते ही समझ...

करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान

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बचपन में हमेशा से सुना हैं की किसी कार्य में निपुण होना हैं तो अभ्यास जरुरी हैं। श्रीरामचरितमानस में उल्लेख हैं "करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान"। बस अगर कोई चीज़ हमें किसी से अलग बनाती हैं तो वो हैं उसे करने का का तरीका। किसी ने लिखा हैं की "एक पत्थर ठोकर खाकर कंकर-कंकर हों गया और एक पत्थर ठोकर खाकर शंकर-शंकर हों गया"। साफ़ समझ आता हैं की काम एक ही हैं पर कोई कंकर हुआ तो कोई शंकर। निरंतर अभ्यास किया जाये तो पारंगत होने में देर नहीं लगेगी। अगर उदाहरण की ओर बात की जाये तो वो हैं एकलव्य का जिन्होंने बिना सीखे, गुरु के अभाव में धनुर्विद्या में ऐसी पारंगत हासिल की जिन गुरु द्रोणाचार्य ने उन्हें अपना शिष्य बनाने से मना कर दिया था, वो भी उस विद्या के कायल हों गए।  एक और शायद इससे अच्छा और उदाहरण नहीं हों सकता वो हैं करोली टेकक्स (Karoly Takacs) का, हंगरी (Hungary) सेना के एक जाबांज़ शूटर जो कई नेशनल, कई खिताबों से नवाज़ा जा चूका था पर जिनका बस एक सपना था की ओलिंपिक में गोल्ड जितना।  1936 तक उनसे अच्छा कोई राइट हैंडेड पिस...

हैवानियत की हद ...!!

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कही पर सुना था की यदि कोई गलती हो जाए तो हो सकता वह सच में गलती से ही हुई हो। पर अगर वही गलती बार-बार दोहराई जाए तो निसंदेह वह सोची समझी साजिश हैं।  आज जब पेपर (20 सितम्बर) पर फ्रंट पेज की खबर पड़ी तो एक पल के लिए रूह काँप गयी। खबर थी बीएसएफ के जवान शहीद श्री नरेंद्र सिंह की। सैय्यादों ने 9 घंटे सेना के जवान को मौत का आइना दिखाया, 9 घंटे तक वो बेहरहमी से तड़पाते रहे, कभी करंट लगाया, पैर काट दिया, आँख निकाल ली और इसके बाद भी, इतनी क्रूरता के बाद भी जब चैन न मिला तो गला घोंट कर गोली मार दी, और अंततः भारत माँ की आन-बान की रक्षा करते हुए एक और फौजी शहीद  हो गया।  इस बर्बरता पर कोई प्रश्न खड़े नहीं करता, कोई भी सत्ताधारी आपत्ति लेते हुए मुँह तोड़ जवाबी कार्रवाई का समर्थन नहीं करता और ना कोई विपक्ष में से ढ़ोल पीटता हैं।  केंद्रीय मंत्री इंद्रजीत सिंह बयांन देते है की "यह कोई नई बात नहीं है, पाकिस्तान पहले भी ऐसा करता रहा है।" क्यों ? और सबसे बड़ी विडम्बना तब देखने में आई जब कुछ दिन पहले भारतीय सेना के जवान जब एक आतंकवादी...

“हिन्दी हैं हम”

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हिंदी का इतिहास वर्षों पुराना हैं। यह सिर्फ़ एक ज़बान हीं नहीं बल्कि सांगोपांग तरीक़े से तहज़ीब भी हैं। हिन्दी के शब्द, और हिन्दी भाषा में हीं मिठास झलकतीं हैं। और एक तरीक़े से देखा जाए तो हिन्दी का ह्रदय विशाल हैं जों अपने अधीन बहुत सीं उपभाषाए को समेटा हुआ हैं, जैसे:- मालवी, अवधी, ब्रजभाषा इत्यादि। 1977 में जनता सरकार में विदेश मंत्री के तौर पर काम कर रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने जब संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपना पहला भाषण हिंदी में दिया तब पुरे सदन ने खड़े होकर अभिवादन किया था। हिन्दी दुनियाभर की भाषाओ में अपना विशेष स्थान, अपनी महत्वत्ता के कारण बनाई हुईं हैं। किसी ने कटाक्ष करते हुए कहाँ हैं कीं जिस देश में हिंदी के लियें “2” दबाना पड़े, वह उस देश कीं राजभाषा कैसे हों सकतीं हैं? पर अगर देखा जाए तो आज हिन्दी बोलने में लोग शर्म महसूस करते हैं, मुझे नहीं पता क्यों ऐसा हैं पर में बस इतना हीं बोलना चाहूँगा कीं हिन्दी हिंदुस्तान की सिर्फ़ भाषा नहीं बल्कि मातृभाषा हैं, और दुनिया कीं भाषायें भले कितनी हीं अच्छी हों पर मेरी माँ से ख़ूबसूरत नहीं हों सकतीं। सिर्फ़ हिन्दी में हीं ताक़त ...