जीवन से जिंदगी तक :- एक पहेली
अमूमन यह दोनों शब्द एक दूसरे के पर्याय माने जाते हैं, पर बारीकी से देखा जाए तो दोनो अपनी-अपनी महत्ता पर राज कर रहे हैं। कैसे, आइए जानते है :-
ईश्वर सबको एक समान जीवन प्रदान करता है बिना कोई भेदभाव, जात-पात, रंग-रोगन, ऊंच-नीच, धर्म, को देखते हुए। उस जीवन को जिंदगी में हमे ढालना होता हैं, मतलब हमें खुद अपने एक समान जीवन के सफर को सबसे अलग कर जिंदगी की सड़क पर लाना हैं।
कवि जयशंकर प्रसाद जी की बड़ी सुंदर पंक्तियां हैं :-
'वह पथ क्या, पथिक कुशलता क्या, जिस पथ पर बिखरे शूल न हों,
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या, जब धाराएँ प्रतिकूल न हों ।।
जीवन में उतार-चढाव, सुख-दुख यह सब उतने ही जरूरी हैं जितने किसी चीज को मढ़ने के लिए उच्च तपिश।
बस हम गलती यहा कर बैठते है की इन अस्थाई उतार-चढ़ाव को स्थाई समझ जीवन ही समझ बैठते हैं। बल्कि यह सिर्फ विशालकाय जीवन का क्षण मात्र का हिस्सा हैं।
हम सबके जीवनकाल में परेशानियां, भागा-दौडी, असमंजस की स्थिति अमूमन सबके साथ ही आती हैं, विचार अनेक, राहें अनेक, हम डालमडोल के पसोपेंच में उलझा हुए, कही जगह राहें दिखाने वाले सब अपने-अपने नजरिए से देखने को बोलेंगे और फिर मन में यही आता जो बच्चन साहब ने मधुशाला में बोला हैं :-
किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला
अच्छा इसमें सोचने वाली बात यह भी है की सीधी लकीर की बात तो हो गई, पर ऊंच नीच वाली लकीर की भी अपनी एक सीमा है, उसको भी ज्यादा खींचेंगे तो चोट हमारे ही हाथों में लगेगी। सीधा सा मतलब यह की अगर कोई परेशानी है तो निश्चित तौर पर उसका हल भी है ही, देर बस नजरिया बदलने की हैं। यह सोच लेना ठीक रहेगा कि उलझने मीठी भी होती हैं, जलेबी इसका सटीक उदाहरण हैं।
किसी ने बोला है:-
फ़िक्र सभी को खा गई, फ़िक्र जगत की पीर,
जो फ़िक्र को खा गया, उसका नाम फ़कीर।
इसलिए परेशानी को तवज्जो न देकर उसको इतना भी नही खींचना की उसमे ही ऊलझ जाए।
और होता यही है, हम इतना उलझ जाते की निकालना मुश्किल लगता और वही जीवन लगने लगता। हम परेशानियों में इतने डूब जाते की हमें आस पास के लोग भी जहर लगने लगते, जबकि सबको एक लाठी से हांकना, मानो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना हैं।
अच्छा..अब जीवन में आने वाले पड़ावों पर बात करते हैं
इसी सुंदर जीवन में कुछ चीजें, विषय, वस्तु, लोग तोहफों से कम नहीं होते, जो मानो किस्मत से, कृपा से, कृतज्ञता से, संयोग से मिलते है, और हर चीज, विषय, वस्तु, लोगो का अपना एक किरदार है, अपना एक महत्व हैं।
कभी-कभी ऐसा बोलने में आता न कि जिनके पास नहीं होता उनको कद्र होती, या वो बहुत अच्छे से वैल्यू समझते है और जिनको आसानी से मिल जाता उनके लिए घर की मुर्गी दाल बराबर।
पर यहां इस बात से हम इसको आगे बढ़ा सकते जो वर्षों से रामायण महाकाव्य में निहित है :- भय बिन हुए न प्रीति
जब तक खोने का डर नहीं होगा तब तक प्रीति का बनना असंभव हैं,
इसे आप मिष्ठान रूपी जीवन के चाशनी रूपी हर पड़ाव पर लागू कर सकते है, चाहे बचपन, फिर छात्र जीवन में फैल होने का डर नहीं होगा तो पढ़ाई नहीं होगी, युवा अवस्था में, प्रेम में, वैवाहिक जीवन में इन सब में इसके उदाहरण ढेर हैं।
वर्षों का इंतेज़ार, असीम भक्ति, और भक्ति भी ऐसी आत्म-विश्वास से परिपूर्ण की श्री रघुनंदन कुटिया में जरूर आयेंगे, पर भय इसका इतना की ऐसा न हो वो आए और मुझसे चूक हो जाए इसलिए वर्षों तक, वो दर्शन की लोलुपता, कौनसी घड़ी कौनसे पल की निश्चिता से परे, अनवरत साफ-सफाई, स्वागतातुर मां शबरी, घबराहट भी इतनी की एक एक बेर भी चख-चख मीठे चुन-चुन रखें।
भाव में श्री राम-केवट प्रसंग में दोनों को कुछ न कुछ भय मन में था, पर ऐसी प्रीति बनी की आज तक उदाहरण स्वरूप आपके सामने है।
"मांगी नाव न केवट आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।।
चरन कमल रज कहुं सब कहई। मानुष करनि मूर कछु अहई।।"
प्रेम में गोकुल की गोपियों का भय, ईर्ष्या बिल्कुल नहीं की श्री कृष्ण, मनमोहन, कान्हा, हमारे कन्हैया किस पर कितने मोहित है, बल्कि भय इतना की कही यह हमसे दूर, इस पल या आने वाले दिनों में, सालों में हमसे इस नगरी से एक पल लिए भी ओझल हो गए तो वो कैसे जीवन यापन कर पाएंगी, क्योंकि यह उनकी कल्पना से भी कोसों दूर था।
शत प्रतिशत सत्य, जब-तक माली को फूल सुंदर लगेगा तो वो उसके खिलने का इंतेज़ार करेगा और खिलने पर तोड़ लेगा पर जब उसे उससे प्यार होगा तो वो उस पूरे पेड़ को सहेजेगा, नित्य प्रतिदिन पानी देकर उसकी देख भाल करेगा, यही प्रेम का स्वभाव भी हैं।
आजकल जीवन की उम्र घट सी गई है, कितनी यह अंदाजा भी लगाना मुश्किल काम हो गया है, क्योंकि रोज कुछ न कुछ खबर ऐसी ही मिल रही हैं ।
अब अब ऐसा लगता है कि 70-80 की उम्र 90 के दशक के सोने की कीमत के समान हैं, मिलना मुश्किल, बाकी प्रभु इच्छा।
एक और बात देखे तो बहुत से लोग उनके जीवन की खुशी से ज्यादा किसी और की जिंदगी देख कर दुखी है।
वो कहते है न:-
कोई तन दुखी, कोई मन दुखी, कोई धन बिन रहत उदास।
थोड़े-थोड़े सब दुखी, सुखी राम के दास ।
दुखी होने के हजार कारण है, और हर कोई किसी न किसी बात पर दुखी है, पर अपनी जिंदगानी ऐसी बनाओ जो उन हजार कारण पर भारी पड़े, कभी-कभी एक फूल से सौ गुना उसकी अनेक पंखुड़ी अच्छी होती हैं।
कटु सत्य है की जाना निश्चित है, ऊपर वाले की लाइन अनवरत चल रही हैं। हम सभी वेटिंग में है, कोई पहले तो कोई बाद में, ना किसी से आगे जा सकते जल्दी में, ना देरी के लिए किसी के पीछे, जब समय लिखा है तब ही पर जाना सबको है यह हम सब भली-भांति बहुत अच्छे से जानते हैं।
इसलिए, यत भावों तत् भवति अर्थात् जैसा सोचते है वैसा ढलते है,
अपने जीवन को ऐसे जियो, पल-पल भर की यादों को संजोयो, जीवन से जिंदगी का सफर यादगार बनाओ, मंजिल तो सबको पता है, बस जियो ऐसे जिससे लगे सफर खूबसूरत है मंजिल से भी।
जिंदगी को शान बनाओ, वरना समय तो कट ही रहा है।
यही जीवन है, इसमें भीगे बिना बारिश लिखेंगे तो कागज सुखा ही रह जाएगा।
आनंद फिल्म में राजेश खन्ना जी बड़ी अच्छी सीख दे गए:-
'बाबू मोशाय...जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं'...!!
इसलिए,
तू हँस,
तू मुस्कुरा,
तू रोना कम कर दे,
तू जिंदा है, और
जिंदगी की नाक में दम करदे...!!
That’s really amazing 👏👏 loved it
ReplyDeleteThank You 💫😊✌🏻
Delete🙏🙏
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